मां गढ़ कालिका मंदिर
वैसे तो गढ़ कालिका का मंदिर शक्तिपीठ में शामिल नहीं है, किन्तु उज्जैन क्षेत्र में मां हरसिद्धि शक्तिपीठ होने के कारण इस क्षेत्र का महत्व बढ़ जाता है।
पुराणों में उल्लेख मिलता है कि उज्जैन में शिप्रा नदी के तट के पास स्थित भैरव पर्वत पर मां भगवती सती के ओष्ठ गिरे थे।
लिंग पुराण में कथा है कि जिस समय रामचंद्रजी युद्ध में विजयी होकर अयोध्या जा रहे थे, वे रूद्रसागर तट के निकट ठहरे थे। इसी रात्रि को भगवती कालिका भक्ष्य की शोध में निकली हुई इधर आ पहुंची और हनुमान को पकड़ने का प्रयत्न किया, परंतु हनुमान ने महान भीषण रूप धारण कर लिया। तब देवी डरकर भागी। उस समय अंश गालित होकर पड़ गया। जो अंश पड़ा रह गया, वही स्थान कालिका के नाम से विख्यात है।
गढ़ कालिका.......सतयुग से विराजित शक्ति-संगम-तंत्र का केंद्र
मध्यप्रदेश के उज्जैन के कालीघाट स्थित कालिका माता के प्राचीन मंदिर को गढ़ कालिका के नाम से जाना जाता है। देवियों में कालिका को सबसे महत्वपूर्ण माना गया है। गढ़ कालिका के मंदिर में मां कालिका के दर्शन के लिए रोज हजारों भक्तों की भीड़ जुटती है।तांत्रिकों की देवी कालिका के इस चमत्कारिक मंदिर की प्राचीनता के विषय में कोई नहीं जानता, फिर भी माना जाता है कि इसकी स्थापना महाभारतकाल में हुई थी, लेकिन मूर्ति सतयुग के काल की है। बाद में इस प्राचीन मंदिर का जीर्णोद्धार सम्राट हर्षवर्धन द्वारा किए जाने का उल्लेख मिलता है। स्टेटकाल में ग्वालियर के महाराज ने इसका पुनर्निर्माण कराया। कालिकाजी के इस स्थान पर गोपाल मंदिर से सीधे यहा जाया जा सकता है। गढ़ नामक स्थान पर होने के कारण गढ़ कालिका हो गया है।
मंदिर के प्रवेश-द्वार के आगे ही सिंह वाहन की प्रतिमा बनी हुई है। आसपास दो तरफ धर्मशालाएं है। इसके बीच में देवीजी का मंदिर है। मंदिर के कुछ अंश का जीर्णोद्धार ई.सं. 606 के लगभग सम्राट श्रीहर्ष ने करवाया था। शक्ति-संगम-तंत्र ‘अवन्ति संज्ञके देश कालिका तंत्र विष्ठति‘ कालिका का उल्लेख है। इसी मंदिर के निकट लगा हुआ स्थिर गणेश का प्राचीन और पौराणिक मंदिर है। इसी प्रकार गणेश मंदिर के सामने भी एक हनुमान मंदिर प्राचीन है, वहीं विष्णु की सुंदर चतुर्मुख प्रतिमा है। खेत के बीच में गोरे भैरव का स्थान भी प्राचीन है।
गणेशजी के निकट ही से थोड़ी दूरी पर शिप्रा की पुनीत धारा बह रही है। इस घाट पर अनेक सती की मूर्तियां हैं उज्जैन में जो सतियां हुई है। उनका स्मारक स्थापित है। नदी के उस पार उखरेश्वर नामक प्रसिद्ध श्मशान-स्थली है। यहां पर नवरात्रि में लगने वाले मेले के अलावा भिन्न-भिन्न मौकों पर उत्सवों और यज्ञों का आयोजन होता रहता है। मां कालिका के दर्शन के लिए दूर-दूर से लोग आते है।
गढ़कालिका का मंदिर जिस स्थान पर स्थित है, उसके आसपास के क्षेत्र को गढ़ कहते है। कहते है कि यह महाकवि कालिदास की आराध्या देवी रही है। ऐसी मान्यता है कि कालिदास ने अपने काव्य एवं नाटकों की रचना इसी क्षेत्र में की है। यह तांत्रिक सिद्धि हेतु प्रमुख स्थान रहा है। मंदिर में सिन्दुर चर्चित प्रतिमा का मुखौटा है। मस्तक पर चाँद का टुकड़ा सुशोभित हो रहा है। बाँई ओर महालक्ष्मी तथा दायी ओर माँ सरस्वती की प्रतिमा शोभा बढ़ा रही है। देवी के सामने आँगन में सिंह की मूर्ति बनी हुई है। सभा मण्डप में अनेक देवी-देवताओं के चित्र बने हुए है, जो मंदिर की शोभा बढ़ाते है।
गढ़ कालिका क्षेत्र में पुरातत्व विभाग ने सन् 1956 में खुदाई कराई थी। उसमें बड़ी ईटें, मनके, टकसाल तथा सड़के निकली थी। इससे यह अनुमान लगाया गया कि यह स्थान ई.पू. 500 वर्ष पूर्व में महाराजा चण्डप्रद्योत का गढ़ था। महाराजा चण्डप्रद्योत की कन्या वासदत्ता तथा कौशम्बी के राजा उद्यन की प्रेमकथा का स्थान यही है। कालिदास ने भी इसका संकेत अपने लघु काव्य मेघदूत में दिया है। गढ़कालिका देवी महाकवि कालिदास की अराध्या देवी रही है। इनकी कृपा से ही अल्पज्ञानी कालिदास को विद्वता प्राप्तु हुई थी। त्रिपुरा महात्म्य के अनुसार देश के बारह शक्ति पीठों में से छठा स्थान यहीं है। यह मंदिर जिस जगह पर है वहां पुरानी अवंतिका बसी हुई थी। मंदिर के पीछे श्री गणेश जी की पुरानी पौराणिक प्रतिमा हे तथा सामने पुरातन श्री हनुमान मंदिर है जिसके पास ही दर्शनीय श्री विष्णु प्रतिमा है। कुछ दूरी पर क्षिप्रा नदी है, जहाँ सतियों का स्थान है। उसके सामने ओखरश्मशान है। गौर का स्थान भी इधर है। पुराणों में गढ़कालिका के स्थान का विशेष महत्व है यहाँ दुर्गपाठ की परम्परा है। नवरात्रि में इनकी विशेष आराधनाएं होती है।
